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Saturday, 31 August 2019

ताल गंगवन धाने सुरी | हिन्दी कहानी | Tal gangavn dhane suri | Hindi Story | राजा रानी की कहानी

 कहानी 
  ताल गंगवन धाने सुरी  
 एक नगर में एक राजा और रानी रहते थे वही पर उनके महल के पीछे की ओऱ एक गरीब आदमी भी रहता था। वह गरीब आदमी रोज़ रात को अपनी पत्नी से कहता ओ बच्चों की माँ ले आव ताल गंगवन धाने सुरी वो ले आती और वो सब उसी में लेट जाते थे
 इधर राजा की रानी अपने महल से यह बात रोज़ सुनती थी जब सुनते - सुनते बहुत दिन हो गये तो वह इसका रहस्य जानने में लग गयी और राजा से बोली पड़ोस में कमलू के घर में ताल गंगवन धाने सुरी है और मेरे पास तो बस यही पलंग है , अब मुझको भी कमलू की तरह ताल गंगवन धाने सुरी चाहिए
 यह सब जानने के बाद राजा ने अपने मंत्रियों से कह कर कमलू को बुलवाया और उससे ताल गंगवन धाने सुरी लाने का हुक्म दिया। वह गरीब कमलू बोला महराज मै गद्दे और पलंग की व्यवस्था नहीं कर सकता। इसलिए मेरा वही बिस्तर है। राजा ने कहा कि मेरी रानी को वह बिस्तर चाहिए। तब कमलू बोला महराज कल शाम मै रानी जी के लिए वह बिस्तर तैयार कर लाऊँगा। दूसरे दिन वह पयाल से बना हुआ बिस्तर मतलब जिसको वह ताल गंगवन धाने सुरी कहता था उसे लेकर शाम को वह राज दरबार में पहुँच गया। राजा ने रानी का पुराना बिस्तर उस गरीब आदमी को इनाम स्वरूप दे दिया वह बिस्तर पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ। जब रात को रानी उस ताल गंगवन धाने सुरी में लेटी तो उस पयाल के बिस्तर में उनको नींद भी नहीं आयी और वो पूरी रात बहुत परेशान हो गई। परन्तु उन्होंने राजा जी से कह के ये बिस्तर मगवाया था तो अब क्या करती
 अन्त में रानी ने परेशान हो कर राजा से कहा कि महाराज मैं इस बिस्तर में नहीं सो सकती कमलू की बात सुनकर मैंने बहुत गलत किया है। राजा ने फिर पुनः रानी को सुन्दर से पलंग की व्यवस्था कर दी। 

   कहानी से शिक्षा  
 इस कहानी से हमको ये शिक्षा मिलती है कि जो हमारे पास है उसमे खुश रहना चाहिए

सत्यावान और सावित्री की कहानी | हिन्दी कहानी | Satyavan or Savitri ki khani | Hindi Story



 सत्यावान और सावित्री की कहानी 
 एक राजा थे उनके सावित्री नाम की एक कन्या थी। वह कन्या बड़ी ही सुन्दर और अग्नि के समान तेज वाली थी। सावित्री धीरे - धीरे अपने पिता के घर बड़ी हुई तो राजा ने कन्या के योग्य वर की तलाश किया किन्तु उनको कन्या योग्य वर नहीं मिला तब राजा ने अपनी कन्या से कहा बेटी मुझे तुम्हारे योग्य वर नहीं मिल पा रहा है और ऐसी मान्यता भी है कि कन्या को मासिक आने से पहले उसके पैर पूज लेना ही उचित है अतः बेटी मेरी आभा से अब तुम्ही अपना वर ढूँढोगी राजा की आज्ञानुसार सावित्री और राजा की सेना साथ में वर की खोज के लिए चल दिये ढूढ़ते - ढूढ़ते जंगल में एक लकड़हारा लड़की काट रहा था। सावित्री बोली रथ को रोक दो अब सायद मेरी मंजिल मिल गयी है। सावित्री ने उनको निचे उतरने को कहा वो नीचे उतर कर आये सावित्री बोली मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ आपका नाम क्या है वो बोले मेरा नाम सत्यवान है मेरे माता - पिता दोनों अंधे है और उनका राजपाट भी छिन गया है। मै लकड़ी काटकर ही अपना गुजारा करता हूँ। सावित्री बोली जो भी है अब मैंने आपसे विवाह का निश्चय कर लिया है। ये कहकर सावित्री अपने महल को वापस चली आयी। यहाँ राजा के पास नारद देव जी बैठे हुए थे। राजा बोले क्या हुआ बेटी तब सावित्री बोली हे पिता श्री मैंने अपना वर ढूँढ लिया है। नारद जी बोले और सब तो ठीक है पर सत्यवान की आयु सिर्फ एक वर्ष की है। सावित्री बोली अब तो कुछ भी हो मैंने अपना निश्चय दृढ़ कर लिया है। तब राजा ने बड़े - बड़े विद्वान पंडितों को बुलवा कर विधि - विधान के साथ अपनी बेटी सावित्री का विवाह सम्पन्न कर वाया और बेटी सावित्री सत्यवान के साथ जंगल में रहने लगी और अपने अंधे सास , ससुर की सेवा बड़े आदर पूर्वक करने लगी। पर नारद जी की बताई हुई बात उनके मन में खटकती रहती। धीरे - धीरे समय व्यतीत होता गया और सत्यवान की मृत्यू के चार दिन शेष रह गये तब सावित्री ने कहा मै भी आपके साथ लकड़ी काटने चला करुगीचौथे दिन सत्यवान पेड़ में लकड़ी काट रहे थेतभी उनके सर पे दर्द हुआ और वह नीचे उतर आये। सावित्री से बोले मैं तुम्हारे पैर के ऊपर सिर रख कर लेटना चाहता हूँ और लेट गये। तभी यमदेव आये और बोले तुम हटो मैं इसको ले जाऊगा इसका समय पूरा हो गया है। सावित्री बोली आप मेरे पति को मत ले जाइये। तब यमदेव बोले जिसका समय पूरा हो जाता है उसे इस धरती से जाना ही पड़ता है। सावित्री ने कहा मुझे वरदान दो यमराज बोले मांगो मैं तुमको वरदान दूँगा। सावित्री ने कहा मेरे सास ससुर का राज्य वापस मिल जाये और उनको दिखने लगे और मेरे सौ पुत्र हो। यमदेव बोले ऐसा ही होगा और वरदान देकर चलने लगे तब सावित्री बोली महराज सुनिए आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है मगर मेरे पति को ले जा रहे हो मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ मेरे सौ पुत्र कैसे होंगे। तब यमराज जी ने सत्यवान के प्राण छोड़ दिये और कहा सती तुम जीती और मैं हारा। सावित्री अपना पति पाकर बहुत प्रसन्न हुई तथा उनके सास ससुर को दिखायी देने लगा और माँगे गये सारे वरदान पूर्ण हुए। 
 कहानी से शिक्षा 
 हमेसा अपने सतित्व पर अडिग रहना चाहिए तथा सावित्री जैसी नारी बनना चाहिए

Tuesday, 20 November 2018

भैंस और घोडा कहानी/कहानी भैंस और घोडे की/Khani bhains or ghode ki/Bhais or ghoda/hindi ki khani/Hindi story

  भैंस  और  घोडा  

एक जंगल में एक भैंस और घोडा रहते थे। दोनों में बड़ी मित्रता थी। दोनों एक साथ जंगल में घास खाने जाया करते थे और दोनों बडे प्यार से रहते थे। एक दिन भैंस और घोडे में कुछ अनबन हो गयी, दोनों झगड़ने लगे और उसी जंगल से एक किसान निकल कर जा रहा था। घोडा उस किसान के पास गया और बोला भाई क्या तुम हमारी मदद करोगे ? किसान बोला हाँ, बताओ क्या मदद चाहिए। घोडे ने कहा आप इस भैंस को रस्सी से बांध लो ये बहुत ही मीठा दूध देती है जिसको पीने से आपका स्वास्थ अच्छा हो जायेगा और आप तन्दुरस्त हो जायेगे। किसान बोला हम इसको कैसे पकड़ पायेगे ? घोडे ने कहा आप मेरी पीठ में बैठ जाना हम तेज-तेज दौड़ कर इसको पकड लेगे। किसान ने ऐसा ही किया और भैंस को पकड लिया। अब घोडे ने कहा मैं जाता हू जंगल को, किसान बोला अब मैं तुमको भी नहीं छोडूगा भैस का दूध पीयूँगा और तुम्हारे ऊपर सवारी करके इधर-उधर जाया करुगा। इस तरह भैंस और घोडा जंगल से बस्ती में आये थे।   
                    इस कहानी से हमे ये शिक्ष मिलती है कि मित्र से धोखा करने वाला के साथ खुद धोखा हो जाता है। 
By - S.S.Bhadouria                  

Tuesday, 14 August 2018

सकठ चौथ की कहानी | सकट चौथ की कथा | Sakat chauth story | Story of Sakat Chauth | सकट चौथ (तिल चौथ, तिलकुट चौथ, माही चौथ) | Til Chauth, Tilkut Chauth, Mahi Chauth

|| सकठ  चौथ की कहानी  ||

एक थी देवरानी एक थी जिठानी। देवरानी बड़ी गरीब थी और जिठानी बहुत धनी थी। देवरानी क लड़का जिठानी के घर में काम करता था। एक दिन आया सकठ का त्योहार। उसमे देवरानी जिठानी दोनों ने पूजा करी लीपा , पोता ,अपने -अपने घरों की साफ़ -सफ़ाई करी और व्रत रक्खा। जिठानी के पास सब कुछ था ,पूजा -पाठ के लिए देवरानी बिचारी खेंत गयी और वहाँ से मेड़हा के फूल तोड़ लायी और उसी के लड्डू शकरकन्द सब कुछ बनाया ,बना के पूजा करी सकठ माता को भोग लगायी खुद खायी बच्चों को खिलाई अपने आदमी को खिलायी और सब लोग खा - पीकर सो गये। बारा बजे रात को सकठ माता आयी और उनका दरवाज़ा खटखटाया ,बोली खोल किमाडा ,देवरानी बोली मइया टूटहा टटवा है एक लात मारो अन्दर आ जाओ सकठ माता एक लात मारीन अन्दर आ गयी और बोली गरीबनी हम बहुत भूखी हन कुछ है खाने को।  माता का है मेड़हा के फूल लाई रहन वही हम लोग खाये हैं वही रक्खे हैं ,लेव तुम भी खा लेव सकठ माता लडडू खायेन  खा पीके कहेन की हमको टट्टी आयी है। गरीबनी बोली महरानी करो सारा घर पड़ा है ,पूरे घर मा सोना-सोना टट्टी करी बोली अभी और टट्टी आयी है ,तो कहेन महरानी हमरे ऊपर से कर लेओ ,ऊपर से भी सोना-सोना टट्टी करेन। अब सबेर भा भाई उई लग गई रक्खै-उठावै मा अब जिठानी खिब जाये का उनके लड़िका का देर ह्वैगे, जिठानी आयी दौड़ी-दौड़ी कहे आज लरिकवा का नहीं भेजेव देवरानी बोली अरे भेजन का सकठ माता आयी रहै हमका कुछ दे गयी है वहै धरी-उठा रही हन, अब न अयी लड़िकवा। धीरे-धीरे जिठानी पूछेन का कीन तेऊ, का कीन रहै पूजा ,वही मेड़हा के फूल लाई रहन वही खावा वही सकठ माता का खवावा। अब साल भर उनका जैसे-तैसे कटा, दूसरे साल जब सकठ चौथ आयी तब वऊ गयी खेत से मेड़हा के फूल, शकरकन्दी सब लायी लाके देवरानी की तरह करीन पूजा, बारा बजे रात को सकठ माता आयी कहेन गरीबनी खोल किमाडा, अरे टटवा लाग है एक लात मारेन अन्दर आगयी कहेन भूखी हन का है महरानी वही मेड़हा के फूल लायी रहन वही के लड्डू बनावा है वही खावा है वही धरे है वही तुमहू खा लेव सकठ माता खाके कहेन अब हमको टट्टी आयी हैं। कहेन करो महरानी पूरा घरै पड़ा है।  पूरे घर मा टट्टी-टट्टी करेन कहेन और आयी है ,हमरे ऊपर से कर लेव उनके उपरौते टट्टी-टट्टी करेन। अब सबेर भा तो अपनी देवरानी का खूब गरीयावै, पता नहीं का कीन तेइसी का बतायेस घर भरे मा टट्टी-टट्टी छवैगै कहानी रहै तो खतम।