निबन्ध
केला
केले के वृक्ष का महत्त्व कई क्षेत्रों में है। केले का वृक्ष बहुउपयोगी वृक्ष है। सर्वप्रथम ये वृक्ष हिन्दू रीति -रिवाजो के अनुसार पूजनीय है। इस फल और इसके वृक्ष को शद्ध माना जाता क्योंकि बाकि फलों की तरह जूठन से यानि किसी की खाई हुई गुठली से नहीं उगता है। भगवान विष्णु की आराधना (पूजा ) हेतु केले के वृक्ष में ही पूजा की जाती है। और जब कोई व्यक्ति भगवान सत्यनारायण की कथा करवाता है तो कथा में भी केले के वृक्ष के पत्तों का उपयोग किया जाता है जिसके बिना कथा का आरम्भ नहीं किया जा सकता है।
धार्मिक महत्त्व के अलावा भारत देश के केरला प्रान्त में केले के वृक्ष के पत्तों का उपयोग खाना अर्थात दैनिक भोजन परोसने के लिए किया जाता है। क्योंकि यहाँ पर यह वृक्ष बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता हैं। इस कारण यहाँ पर उसका उपयोग दैनिक कार्यों में किया जाता है और इससे पर्यावरण का भी संरक्ष्ण हो जाता है।
केले के वृक्ष के फलों का भी सेवन किया जाता है। केले फल को कच्चें और पक्के दोनों रूप में पसंद किया जाता है। कच्चे केले या हरे केले की सब्ज़ी , पकोड़ी , पापड़ आदी बनाया जाता है जो बहुत ही स्वादिष्ट होते है। पक्के केले का रंग बाहर से पीला होता है और अंदर सफेद होता है। यह बहुत मीठा और मुलायम होता है। पुरे भारतवर्ष में यह बहुत पसंद किया जाता है।
केले का फल बहुत ही मुलायम होता है और बहुत फायदेमन्द होता है इसलिए यह छोटे बच्चों को खिलाया जाता है। केले में अधिक मात्रा में वसा पाया जाता है।
केला एक एसा वृक्ष है जो अत्यन्त लाभदायक होता है। इसलिए केले का प्रचलन सम्पूर्ण भारतवर्ष में है और यही नहीं अन्य देशों में भी यह प्रचलन में है।
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