Showing posts with label Kanpur. Show all posts
Showing posts with label Kanpur. Show all posts
Friday, 18 September 2026
Thursday, 18 June 2026
Shree Chandramoleshwar Mahadev Temple Akhari Kanpur श्री चंद्रमौलेश्वर महादेव अखरी
श्री चंद्रमौलेश्वर महादेव अखरी
श्री चंद्रमौलेश्वर महादेव मंदिर अखरी, प्रेमानंद महाराज जी की जन्म स्थली पर बना एक अति सुन्दर शिव मंदिर हैं। सफेद पत्थरों से निर्मित इस मंदिर कि स्थापना १७ जून २०२६ (17 June 2026) को हुईं हैं। इस गांव की पावन धरा पर श्री प्रेमानंद महाराज जी का जन्म हुआ था। अखरी, अपनी जन्मभूमि में मंदिर बनवाना महाराज जी का सपना था जो अब पूरा हो गया।
![]() |
| Shree Chandramoleshwar Mahadev Temple Akhari |
Videos
Thursday, 15 May 2025
कानपुर में शक्ति के भवन Kanpur ke parshidha Mata ke Mandir | Shakti ke bhavan | Maa ke Mandir
कानपूर में शक्ति के भवन
कानपूर में शक्ति के अनेकों उपासक हैं। शहर के हर कोने में आपको मां के एक न एक स्वरूप के दर्शन होंगे। जिनमें से कुछ सुप्रशिद्ध मां के भवनो का आइये जानते है मान्यता और इतिहास ......
बारा देवी मंदिर
शहर के दक्षिण क्षेत्र में स्थापित बारा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का इतिहास 1500 से 1700 वर्ष पुराना माना जाता है। नवरात्र के दिनों में देवी माँ की आराधना के लिए यहां हजारों भक्त प्रतिदिन पहुंचते हैं। सप्तमी के दिन मां के गांव अर्रा से आया तेल अर्पित किया जाता है। यहां पर नवरात्र के दिनों में मुंडन संस्कार भी बड़ी संख्या में होता है। देवी मां के दरबार में भक्त श्रीफल अर्पित कर समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
इतिहास
कहा जाता है एक बार पिता लठुआ बाबा से अनबन होने पर उनके कोप से बचने के लिए अर्रा गांव स्थित घर से एक साथ 12 बहनें भाग गई थीं। भागते - भागते थक गईं तो किदवई नगर में शिला के रूप में स्थापित हो गई। उसी समय बहनों के श्राप से लठुआ बाबा भी पत्थर के बन गए। उसी समय से सदियों पुराने मंदिर में नवरात्र की सप्तमी के दिन बर्रा गांव से तेल आता है जो यहां के लोगों द्वारा माता पर चढ़ाया जाता है। पत्थर बनीं यही 12 बहनें बारा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
मान्यता
नवरात्र में पूजन अर्चन करने के लिए देशभर से लोग बारा देवी मंदिर पहुंचते हैं। इन्हीं देवियों के नाम से दक्षिण के ज्यादातर क्षेत्रों के नाम रखे गए हैं। बर्रा एक से लेकर बर्रा नौ तक ,बिनगवां ,बारा सिरोही और बर्रा विश्व बैंक का नाम भी देवी के नाम पर ही रखा गया है। पुरातत्व विभाग की टीम ने इसका सर्वेक्षण किया था और यह पाया था कि मंदिर की मूर्ति लगभग 1500 से 1700 साल पुरानी है।
जंगली देवी मंदिर
शहर के प्रमुख चौराहे किदवई नगर के पास माता जंगली देवी का भव्य मंदिर स्थित है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों भक्त मां के दर्शन कर सुख - समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र में यहां शहर के साथ कई राज्यों से भक्त दर्शन पूजन के लिए आते हैं। मां के खजाने वितरण के दिन हजारों भक्त मां के दरबार में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। मान्यता है कि मां का दर्शन कर मांगी गई मुराद पूरी हो जाती है। खजाने को घर में रखने से धन की कमी नहीं होती है। भक्तों को मां के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं।
इतिहास
मंदिर का इतिहास लगभग 1100 वर्ष पुराना है। प्राचीन मंदिर की खोज वर्ष 1925 में मुहम्मद बकर की खोदाई के दौरान मिले ताम्रपत्र के आधार पर हुई। जब उस ताम्रपत्र को पुरातत्व विभाग लखनऊ को सौंपा गया तो पता चला कि मंदिर पर विक्रम संवत 893 अंकित है। ताम्रपत्र में लिखा था कि यह भूभाग कान्यकुब्ज प्रदेश है, जो राजा भोज देव की आधीन आता है। उस समय राजा भोज देव ही मंदिर की देखरेख करते थे।
मान्यता
मंदिर में मां का शृंगार पूजन करने से मनोकामना पूरी होती है। मंदिर में वर्ष 1979 से नरंतर मां की अखंड ज्योति चल रही है, जो भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। भक्त मां का पूजन कर अखंड ज्योति के दर्शन जरूर करते हैं। मां को श्रीफल और चुनरी अर्पित करने से सुख - समृद्धि की प्राप्ति होती है। नवरात्र में मां के दर्शन को दूर - दूर से भक्त आते हैं।
चण्डिका देवी मंदिर
शक्ति स्वरूपा मां चण्डिका देवी का प्राचीन मंदिर शहर के देवनगर क्षेत्र में स्थित है। प्राचीन मंदिर के नाम पर ही चण्डिका देवी चौराहे का नाम पड़ा है। लगभग 200 वर्ष प्राचीन चण्डिका देवी मंदिर में मां के दिव्य स्वरूप के साथ विह्नहर्ता गणेश महाराज व भैरव महाराज विराजमान हैं। मंदिर में प्राचीन कुंआ भी है। जहां पर शादी में कुआं पूजन के साथ हवन व अन्य संस्कार पूजन होते हैं। नवरात्र के दिनों में मां को प्रतिदिन सवा मन हलवे का भोग अर्पित किया जाता है। शहर के साथ कई राज्यों से भक्त नवरात्र के दिनों में मां का दर्शन पूजन करने के लिए आते हैं। मां के दरबार में दर्शन के लिए जो भक्त आते हैं,उन्हें मां के श्री चरणों में अर्पित भोग प्रसाद दिया जाता है। नवरात्र के दिनों में मां को हलवा और चने का भोग अर्पित कर भक्त समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। नवरात्र में मां का मनोहारी शृंगार भक्तों को आकर्षित करता है। मां का दिव्य स्वरूप देखने के लिए नवरात्र में सैकड़ों भक्त मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में परिवार सहित दर्शन करने भक्त दूर-दूर से आते हैं।
इतिहास
चण्डिका देवी मंदिर में लगभग 76 वर्षों से अखंड ज्योति कमल के पत्ते पर जल रही है। वर्ष में पड़ने वाले दोनों नवरात्रों में अखंड ज्योति के लिए पात्र में तेल डाला जाता है। राजस्थानी शिल्पकला से निर्मित मंदिर में मां भवानी के साथ विह्नहर्ता और भैरव महाराज की मूर्ति स्थापित है। मंदिर में नवरात्र के दिनों में 108 नारियल अर्पित कर मां का पूजन किया जाता है। प्राचीन मंदिर में जल रही मां की अखंड ज्योति के दर्शन करने के लिए देशभर से भक्त मंदिर पहुंचते हैं।
मान्यता
मंदिर में 76 वर्षों से निरंतर अखंड ज्योति कमल के पत्तों पर तैरते हुए प्रज्वलित हो रही है। इसे मंदिर के सर्वराकार ने प्रज्वलित किया था। तब से यह निरंतर जल रही है। मंदिर के गर्भ गृह में एक दर्पण लगाया गया है, जिसमें मां के दर्शन करने पर मां का शीश कुछ झुका हुआ दिखता है। मान्यता है कि अष्टमी पूजन के समय के लिए मां का शीश सीधा भक्तों को दिखने लगता है।
ज्वाला देवी मंदिर
भीतरगांव ब्लाक के बेहटा गंभीरपुर गांव स्थित मां ज्वाला देवी का मंदिर करीब पांच सौ साल पुराना है। मंदिर में पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्र की सप्तमी और अष्टमी को यहां मेले का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही रामलीला का भी आयोजन होता है। इसमें बड़ी संख्या में भक्त देशभर से मां के दर्शन को आते हैं। मंदिर में कुंड रूप में माता का पूजन होता है। मां ज्वाला देवी के दरबार में नवरात्र के दिनों की छठा मनोहारी होती है। भक्तों के जयकारों से देवी मंदिर गूंज उठते हैं। हर भक्त श्रद्धाभाव से मां के दर्शन व प्रार्थना करता है।
मान्यता
ग्रामीणों के मुताबिक, गांव के ही एक मराठन बाबा हिमाचल प्रदेश स्थित ज्वाला देवी मंदिर से जलती हुई ज्योति लेकर आए थे। तब से यहां पर लगातार ज्योति जल रही है। मंदिर में माता कुंड के रूप में मौजूद हैं। यहां पहुंचने वाले भक्त कुंड को जल से भरकर अपनी मनोकामनां मांगते हैं,जिसे मां पूरी करती हैं।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
कानपूर या अन्य जनपदों से आने वाले लोग रमईपुर से साढ़ होते हुए भीतरगांव के बेहटा गंभीरपुर पहुंच सकते हैं। इसके साथ ही हमीरपुर,भोगनीपुर और पुखरायां की ओर से जाने वाले लोग पहले घाटमपुर आकर यहां के कुष्मांडा देवी तिराहा से साढ़ को जाने वाले रोड से होते हुए मंदिर पहुंच सकते हैं।
बंदी माता मंदिर चौबेपुर
चौबेपुर में गंगा के किनारे स्थित बंदी माता घाट अति प्राचीन है। यहां पर दूर-दूर से लोग स्नान और पूजन पाठ करने आते हैं। मान्यता के अनुसार यहां लोग बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं। यहां स्थित प्राचीन मंदिर शहर के साथ देशभर के भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां पर नवरात्र के दिनों में भक्त आकर विधिवत पूजन अर्चन कर मां से समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। मां के दरबार में भोर पहर से भक्त पहुंचने लगते हैं और मंदिर में गंगा जल अर्पित करते हैं नवरात्र में मां के दर्शन मात्र से भक्तों का कल्याण होता है। मां भक्तों की मुराद को पूरा कर उनका कल्याण करती हैं। मां का दरबार सच्चा है यहां हर भक्त की मुराद पूरी होती है।
इतिहास
त्रेतायुग में भगवान राम ने सीता माता का जब परित्याग किया तो वह बिठूर के अरण्य क्षेत्र में पहुंचीं। गंगा के किनारे अटवा गांव के पास उन्होंने बालू की मूर्ति बनाकर पूजा अर्चना शुरू की। जब वे यहां से जाने लगीं तो एक देवी प्रकट हुईं। उन्होंने माता सीता से कहा कि वह उन्हें छोड़कर न जाएं। इस पर सीता जी ने वैदेही की शिला घाट पर स्थापित की। तब से इस स्थान को वैदेही माता का मंदिर कहा जाने लगा। बाद में लोग भाषा में इसे लोग बंदी माता का मंदिर कहने लगे।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
चौबेपुर से पांच किलोमीटर दूर बंदी माता मार्ग पर अटवा गांव में गंगा के किनारे मंदिर है। यहां मैनावती मार्ग होते हुए बिठूर से पहुंचा जा सकता है।
दुर्गा देवी मंदिर
महाराजपुर के महोली गांव में स्थित मां दुर्गा देवी का मंदिर कई सौ साल प्राचीन है। यहां मां भगवती त्रिशक्ति के रूप में विराजमान हैं। मध्य में स्थित मां काली की प्रतिमा को मुगलों के समय नष्ट करने का प्रयास किया गया था। मां काली से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। भक्त श्रीफल और चुनरी के साथ घंटा मां को अर्पित करते हैं। दुर्लभ चित्रकारी व नक्काशी मंदिर की प्राचीनता को दर्शाती है। दुर्गा अष्टमी के दिन मां की भव्यता व दिव्यता के अद्भुत दर्शन होते हैं। मंदिर में हजारों वर्ष प्राचीन काली मां की प्रतिमा का शृंगार करने के लिए भक्त शहर और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
इतिहास
मंदिर के गर्भगृह में 40 वर्षों से लगातार अखंड ज्योति प्रज्वलित है। मंदिर में प्रत्येक माह की पूर्णिमा को विधि-विधान से हवन किया जाता है। प्रत्येक नवरात्र में अष्टमी के दिन दुर्गा महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन मां का भव्य शृंगार किया जाता है। यहां प्रतिवर्ष रामलीला व मेले का आयोजन होता है। प्राचीन मंदिर की शैली भक्तों को अपनी प्राचीनता से परिचित कराती है।
मान्यता
भक्तों के मुताबिक अष्टमी के दिन मां के दरबार में कच्चा नारियल अर्पित कर जो भी मुराद मांगी जाती है,वह जरूर पूरी होती है। जीवन से निराश और हताश जो भी भक्त सच्चे मन से मां के दर्शन करता है उसकी झोली मां भरती हैं। दुर्गा मंदिर क्षेत्र का सबसे प्राचीन मंदिर है।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
मंदिर कानपुर-प्रयागराज हाईवे पर महाराजपुर क्षेत्र में महोली गांव में स्थित है। रामादेवी से आने पर सरसौल पार कर हाईवे पर स्थित महोली मोड़ से आधा किमी अंदर बाएं हाथ चलना पड़ेगा। फतेहपुर से आने वालों को छिवली नदी पार कर पुरवामीर से लगभग एक किमी आगे चलने पर महोली मोड़ जाएगा।
पंथा देवी मंदिर
बिठूर के मैनावती नगर स्थित पंथा देवी के मंदिर का इतिहास सतयुग से जुड़ा है। यहां भक्त चुनरी और नारियल माता को अर्पित करते हैं। मंदिर से शहर के साथ आसपास जिलों के ग्रामीण शुभ कार्य की शुरुआत से पहले यहां पूजन कसने आते है। मां को विवाह का सबसे पहला निमंत्रण ग्रामीण आज भी देते हैं। नवरात्र के दिनों में मां के दरबार में भक्तों का संगम देखने को मिलता है। सतयुग के इस प्राचीन मंदिर में मां पंथा देवी के दर्शन करने से संकट से मुक्ति मिलती है। मां हर भक्त की कठिनाई भरी राह को आसान करती हैं। नवरात्र के दिनों में मां के दरबार में देशभर से भक्त आते हैं।
इतिहास
पंथा देवी मंदिर को पथिकेश्वरी देवी के रूप में जाना है। मां की पूजा अर्चन करने से पथ में कोई कभी रुकावट नहीं आती है। मां हर पथ को सरल कर देती हैं। इसलिए भक्तों ने मां के मंदिर का नाम पंथा देवी रखा। भक्त महाबीर गौड़ के मुताबिक पंथा देवी मंदिर में बाजीराव पेशवा द्वितीय पूजा पाठ करने आते थे। बिठूर के लोग देवी मां को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
मान्यता
भक्त आरती कश्यप ने बताया कि मां को गुड़हल का पुष्प अर्पित करने से मां की कृपा प्राप्त होती है। मां के दरबार में श्रीफल और चुनरी अर्पित करने के लिए नवरात्र में हजारों भक्त पहुंचते हैं। कहा जाता है कि मां के दरबार में शिवराजपुर के बंदी माता घाट से जल भरकर अर्पित किया जाता है, जिससे भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मां के दरबार में खोखो मइया भी विराजमान हैं।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
उन्नाव, कन्नौज, लखनऊ और बिल्हौर की ओर से आने वाले भक्त राम धाम चौराहे पर पहुंचकर मां के दरबार में दर्शन करते के लिए आते हैं। राम धाम चौराहे से 500 मीटर की दूरी पर मां का दरबार स्थित है। शहर की और से आने वाले भक्त मैनावती मार्ग होते हुए मां के दरबार पहुंच सकते हैं।
दुर्गा मंदिर दबौली
शहर के दक्षिण में दबौली स्थित दुर्गा मंदिर की स्थापना वर्ष 1979 में की गई थी। मंदिर में मठिया के रूप में विराजमान मां अब भव्य दरबार में भक्तों पर कृपा लुटाती हैं। मंदिर में देवी मां के साथ शिव परिवार,श्रीराम दरबार,गणेश महाराज,राधा-कृष्ण और शनिदेव की प्रतिमाएं स्थापित हैं। नवरात्र के दिनों में मां के दर्शन के लिए शहर के साथ आसपास जिलों से बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। प्रतिदिन मां की आरती में सैकड़ों भक्तों के साथ दबौली बाजार के भक्त शामिल होकर मां का वंदन करते हैं। नवरात्र के दिनों में मां के दरबार की रौनक देखने लायक होती है।
इतिहास
मंदिर की स्थपना क्षेत्रीय लोगों ने की थी। इसके बाद से पंडित अशोक दीक्षित और पंडित निर्मल दीक्षित मंदिर में मां की सेवा कर रहे हैं। भक्तों के मुताबिक,मंदिर में पहले मां एक मठिया के रूप में विराजमान थीं। बुंदेलखंड शैली में बने प्राचीन मंदिर में देवी मां के मनोहारी स्वरूप के दर्शन होते हैं। मंदिर में माता की रसोई में दिव्यांगों को निश्शुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है। वहीं,यज्ञशाला में वर्षभर हवन पूजन का आयोजन कर वातावरण की शुद्धि की जाती है।
मान्यता
भक्त बताते हैं कि मंदिर में वर्षों से देवी मां के समक्ष ईंट पूजन की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि मंदिर में नई ईंट का पूजन देवी मां के समक्ष करने से भक्तों की मुराद पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद उस नई ईंट का प्रयोग मंदिर निर्माण के लिए किया जाता है। मन्नत पूरी होने के बाद भक्त मां का शृंगार करते हैं। मंदिर में पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए वट वृक्ष,बरगद,आम और अन्य प्रकार के पेड़-पौधे लगाए जाते हैं।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
दबौली स्थित दुर्गा मंदिर पहुंचने के लिए सीटीआइ चौराहे,शास्त्री चौक होते हुए दबौली तक सीधा साधन उपलब्ध है। जहां से मां के दरबार में पहुंचा जा सकता है।
काली माता मंदिर
काली माता मंदिर हरजिंदर नगर, सुभाष रोड में स्थित है। कानपुर मध्य में स्थित इस मंदिर का इतिहास 100 से 150 वर्ष पुराना माना जाता है। नवरात्र के दिनों में देवी माँ की आराधना के लिए यहां हजारों भक्त प्रतिदिन पहुंचते हैं। यहां पर नवरात्र के दिनों में मुंडन संस्कार भी बड़ी संख्या में होता है। प्रति वर्ष शीतला अष्टमी के दिन मां का मोहक शृंगार, विशाल जावरा यात्रा, भंडारा प्रसाद वितरण और पाँच दिनों के लिए मेले का सुंदर आयोजन होता है।
इतिहास
काली माता मंदिर का इतिहास 100 से 150 वर्ष पुराना माना जाता है। 25 वर्ष पहले सफीपुर और काजीखेड़ा के लोगो द्वारा मंदिर का सुंदरीकरण कराया गया था। मंदिर में काली माता की तीन मठिया स्थापित है और महाबली हनुमान, शीतला माता, भगवान भैरव और शिवलिंग भी स्थापित है।
मान्यता
दूर-दूर से भक्त जन मां से अपनी मुरादें मांगने आते हैं, मां का पूजन कर शीतला आष्टमी के दिन होने वाली जावरा यात्रा में शामिल होते हैं, मां की दयाद्रष्टि सहदेव उनपर बनी रहती हैं। मां के दरबार में घंटा चढ़ाने की भी मान्यता है।
आदि शक्ति मां दुर्गा मंदिर
शक्ति स्वरूपा आदि शक्ति मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर शारदा नगर में स्थित है। मंदिर में मां के आदि शक्ति दुर्गा के रूप के साथ राधा - कृष्ण , श्रीराम दरबार , श्री भीमशंकर महादेव , श्री गोवर्धन पर्वत और शनि देव विराजमान हैं। मंदिर में बनी यञशाला में हवन पूजन नियमित रूप से किया जाता है। नवरात्र के दिनों में मां के दर्शन करने के लिए शहरभर के भक्त मंदिर पहुंचते हैं। महिलाएं मां का शृंगार कर विधिवत पूजन अर्चन करती हैं। मां से सुहाग और बच्चों की समृद्धि की कामना के लिए नवरात्र के दिनों में पाठ और रामनवमी को विशेष पूजन और यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
इतिहास
मंदिर के पुजारी नरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि शारदा नगर क्षेत्र में देवी मां का कोई दूसरा मंदिर नहीं होने के चलते भक्तों ने आपसी सहयोग से 30 वर्ष पहले मंदिर का निर्माण कराया था। सबसे पहले श्री दास हनुमान की प्रतिमा स्थापित की गई थी। इसके बाद नर्मदा नदी से बाबा भीमशंकर का शिवलिंग लाकर स्थापित किया गया। भक्त दूर - दूर से आकर मां का पाठ करते हैं। राजस्थानी शिल्प में बना मंदिर आस्था का केंद्र है। मंदिर की प्रतिमाए राजस्थान से लाई गई थीं।
ऐसे पहुंचे मां के दरबार
बिल्हौर,कल्याणपुर,से आने वाले भक्त गुरुदेव चौराहे से शारदा नगर पहुंचकर श्री राधाकृष्ण मंदिर में विराजमान मां के दर्शन करते हैं। वहीं, रामादेवी की और से आने वाले भक्त भी गुरुदेव चौराहे से मंदिर पहुंच सकते है। नवरात्र के दिनों में गुरुदेव चौराहे से मंदिर तक के लिए साधन उपलब्ध रहता है।
Read more :-
Saturday, 23 March 2024
कानपुर का इतिहास Kanpur's history
कानपुर
ब्रम्हांड का केंद्र
ब्रम्हांड का केंद्र , क्रांति की धरा , कर्मयोगियों की औद्योगिक नगरी , कमल के धनी साहित्यकारों की कर्मस्थली वाला गौरवशाली शहर है कानपुर। वह कानपुर जिसके रक्त की हर बूंद स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई करती है। वह कानपुर , जो आजाद हिंद फौज को पहली महिला कैप्टन लक्ष्मी सहगल देता है। वही कानपुर अब २२२ (222)साल का हो गया है जिसकी स्थापना २४ (24) मार्च १८०३ (1803) को हुई थी।
मूल नाम
सुप्रशिद्ध नगर कानपुर का नाम २० (20) बार बदला गया है। इसका मूल नाम 'कान्हपुर ' था। जन्माष्टमी के दिन पड़ी थी नींव ,इसलिए कहलाया कान्हपुर। १७७० (1770) में पहली बार गेब्रियल हार्पर ने CAWNPOOR कहकर सम्बोधित किया। इसका दस्तावेजों में जिक्र मिलता है। १९४८ (1948)में यह KANPUR कहा जाने लगा।
इन नामों से भी जाना गया : कान्हपुर , कर्णपुर , कन्हैयापुर
कानपुर के १५ (15) परगन
कानपुर ज़िले २४ मार्च १८०३ (24 मार्च 1803) को १५ (15) परगने मिलाकर बनाया गया था। ज़िले में उस समय बिठूर ,शिवराजपुर ,डेरापुर ,घाटमपुर , भोगिनीपुर , सिकंदरा , अक़बरपुर , औरैय्या , कन्नौज , सलेमपुर , अमौली , कोढ़ा , साढ़ , बिल्हौर और जाजमऊ शामिल किए गए थे।
कानपुर का इतिहास
कानपुर शहर का मूल नाम 'कान्हपुर ' था। इस नगर की मूल उत्पत्ति का सचेंडी के राजा हिन्दू सिंह से या महाभारत काल के वीर कर्ण से संबध्द होने की कहानियों के बीच यह प्रमाणित है कि अवध के नवाबों के शासनकाल के अंतिम चरण में यह नगर पुराना कानपुर ,पटकापुर , जूही तथा सिमामऊ गांवो से मिलकर बना था।
जाजमऊ से बिठूर तक जंगल था। इसके बीच गंगा किनारे एक मोजा कान्हपुर है। इतिहासकार बताते हैं कि सचेंडी के राजा हिंदू सिंह भादौ की अष्टमी को गंगा नहाने आया करते थे। तभी उन्हें यह रहने के अनुकूल स्थान समझ आया। राजा ने इसे आबाद करने की चर्चा की ,मंत्रियों और राजा के गुरु ने भी इसे उत्तम बताया जिसके बाद उसी दिन राजा ने आबादी की बुनियाद रखी। कन्हैया अष्टमी के दिन इसकी नींव पड़ने से नाम कान्हापुर पड़ा। राजा हिंदू सिंह ने रमईपुर के राजा घनश्याम सिंह चौहान को आबादी बसाने की जिम्मेदारी दी। इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि यहां ब्राह्मण , ठाकुर , बेहना , दरजी , मल्लाह और दूसरी जातियों के लोग रहने लगे। वह बताते हैं कि लाला दरगाही लाल वकील तवारीख -ए -जिला कानपुर १८७५ (1875 ) के प्रथम खंड में सचेंडी के राजा हिंदू सिंह द्वारा कानपुर को बसाने का उल्लेख है। कानपुर की स्थापना राजा कान्हदेव द्वारा किए जाने का वर्णन मिलता है।
कलम के धनी साहित्यकारों की कर्मस्थली
यहां कला , साहित्य , कविताओं के ऐसे धुरंधर रहे जिन्होंने वैचारिक क्रांति की न सिर्फ नींव रखी बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के विरोध का साहस भरा।
क्रांति की धरा
कानपुर क्रांति की धरा रही हैं फिर चाहे वो सत्तीचौरा घाट पर अंग्रेजों की लाशें बिछाने की बात हो या सत्तीचौरा घाट का इतिहास हो। यहां की माटी में ही स्वाधीनता की अलख जगाने वाले नायब और बेशकीमती हीरों ने जन्म लिया , जिनकी अभिव्यक्ति और दूरदर्शिता ने समाज को परतंत्रता का आइना दिखाया। अंग्रेजों ने न जाने कितने देशभक्तों को फांसी दी , कितनों को जेल में ठूंसा , लेकिन आजादी की लड़ाई का कारवां कभी थमा नहीं।
देश भर में उद्योगों का जलवा
औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले शहर कानपुर में एनटीसी - बीआइसी की मिलें बंद हो गईं , लेकिन चमड़ा उद्योग में कानपुर अग्रिम पंक्ति में है।
ट्राम से मेट्रो तक का सफर
प्रगति के ट्रैक पर तेजी से दौड़ रहे शहर का हुलिया बदल रहा है। कभी यहां ट्राम चलती थी , अब मेट्रो दौड़ रही है। बिठूर , घंटाघर यहां की विशेषता बताते हैं।
Read more :-
Saturday, 1 April 2023
कानपुर के सुप्रसिद्ध शिवालय Kanpur ke parshidha Shiv Mandir | Bhagvan Shiv Ke Mandir
कानपुर के सुप्रसिद्ध शिवालय
कानपुर असंख्य शिव भक्तो का डेरा तो हैं हि साथ ही ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व वाले शिवालयों से भरा शहर है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना के समय स्वयं ब्रम्हाजी ने बिठूर के ब्रह्मावर्त घाट पर ब्रह्मेश्वर महादेव ,शिवराज के पास खेरेश्वर महादेव ,बनीपारा के पास बाणेश्वर महादेव ,इटारा बनी गांव के वनखंडेश्वर और बाराबंकी में लोधेश्वर महादेव की स्थापना की। आनंदेश्वर ,सोमनाथ और सिद्धनाथ महादेव मंदिर में भक्तों की अटूट आस्था हैं। आइये ,जानते हैं कानपुर के शिव मंदिरों का महत्व और इतिहास .....
आनंदेश्वर मंदिर
मान्यता अनुसार आनंदेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग कुंती पुत्र दानवीर राजा कर्ण के यज्ञ कुंड के पिंड से बना। अतः आनंदेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारतकालीन है। आनंदी नामक श्यामा गाय जंगल में चरने जाती थी और एक स्थान पर रोज़ाना खड़ी हो जाती तो उसका दूध अपने आप गिरने लगता था। इसका रहस्य जानने के लिए जब खोदाई हुई तो यह शिवलिंग मिला। अतः गाय के नाम पर ही मंदिर का नाम आनंदेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। यह मंदिर गंगा तट पर स्थापित है। मनोकामना पूर्ति के लिए श्रद्धालु महादेव का गाय के दूध , इत्र और चमेली के तेल से भी अभिषेक करते हैं।
खेरेश्वर मंदिर
शिवराजपुर से ढाई किलोमीटर दूर छतरपुर गांव स्थित खेरेश्वर महादेव का मंदिर महाभारत काल का है। मान्यता अनुसार खेरेश्वर महादेव शिवलिंग के दर्शन के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा प्रातःकाल आते हैं और सर्वप्रथम पूजन करते हैं। रात्रि में शयन आरती के समय मंदिर की धुलाई होती हैं और शिवलिंग पर चढ़ाए गए पुष्प हटा दिए जाते हैं , पर मंगला आरती के लिए जब भोर में मंदिर के पट खुलते हैं तो कुछ पुष्प व जल शिवलिंग पर चढ़ा हुआ मिलता है। यहां आसपास के जिलों से ले दूर - दूर से श्रद्धालु जन पूजन के लिए आते हैं। श्रद्धालुओं की यहां अपार भीड़ उमड़ती हैं। माना जाता है कि शिवलिंग के दर्शन से बाधाए दूर होती हैं। खेरेश्वर महादेव में श्रावण मास में दुग्ध अभिषेक का विशेष महत्व है। भगवान शिव जी को अतिप्रिय श्वेत रंग के कमल पुष्प मंदिर के सामने स्थित तालाब में बहुतायत संख्या में है। श्रद्धालु प्रभु का कमल के पुष्प से शृंगार करते हैं। यह स्थल बहुत ही रमणीय हैं। यहां पर्यटक भी खूब आते हैं।
VIDEO
जागेश्वर महादेव
जागेश्वर महादेव एक सुप्रशिद्ध मंदिर हैं मान्यता है कि २४ (24) घंटे में तीन बार सुबह , दोपहर और रात्रि में शिवलिंग का रंग बदलता है। ख्योरा स्थित जागेश्वर महादेव मंदिर भक्तों की अटूट आस्था का केंद्र है। स्थित वर्षो पुराने पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करने वालों भालतों की मनोकामना जरूर पूरी होती है। बाबा जागेश्वर ने सबसे पहले जागे मल्लाह को दर्शन दिया था। इसी वजह से इस मंदिर का नाम जागेश्वर मंदिर रखा गया। मान्यता हैं कि आज जहां पर जागेश्वर मंदिर स्थापित है , पहले वहां टीला था। बताया जाता है कि इस टीले पर जागे नामक एक किसान की गाय चरती थी और वह एक स्थान पर दूध गिरा देती थी। एक दिन जागे ने जब वहां खुरपी से खुदाई शुरू की तो शिवलिंग मिला। खुदाई के समय शिवलिंग पर भी खुरपी लगी थी। जागेश्वर महादेव शिवलिंग पर आज भी खुरपी के निशान हैं। यह कानपुर के सिद्ध और प्रशिद्ध शिवालयों में से एक हैं।
सिद्धनाथ मंदिर
सिद्धनाथ यानि कानपुर की काशी। राजा ययाति के काल से मंदिर का इतिहास होने की वजह से यहां कानपुर ही नहीं , बल्कि आसपास के जिलों से भी असंख्य श्रद्धालु जन आते हैं। यह मंदिर गंगा नदी के तट पर स्थित हैं। सिद्धनाथ घाट पर प्रतिदिन होने वाली आरती भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र होती है। मंदिर में श्रावण मास में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है। आम दिनों में भी श्रद्धालु दर्शन - पूजन को भारी संख्या ,में आते हैं। माँ गंगा के पावन तट पर स्थित नगर के जाजमऊ इलाके में स्थापित भगवान सिद्धनाथ मंदिर का इतिहास पांच हजार साल से भी अधिक पुराना है। भक्त मानते हैं कि सिद्धनाथ भगवान के दर्शन से कामनाओं की पूर्ति होती है। यह मनोहारी स्थल दूसरी काशी के रूप में विख्यात है। यहां स्थापित शिवलिंग की गहराई नापने को दो बार खोदाई भी हो चुकी है , किन्तु इसके अंतिम छोर का पता नहीं चला। कहा जाता है कि राजा ययाति द्वारा कराई गई खोदाई में यहां शिवलिंग की प्राप्ति हुई थी। महाराज ने यहां सौ यज्ञ का संकल्प लिया। ९९ (99) यज्ञ पूरे हो गए थे किन्तु जब अंतिम यज्ञ शुरू हुआ तो एक कौवे ने यज्ञ कुंड में हड्ड़ी गिरा दी। इस कारण से यज्ञ भंग हो गया। सौ यज्ञ पूरे हो जाते तो फिर इस स्थल को दूसरी काशी का दर्जा प्राप्त हो जाता।
VIDEO
सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर में भक्तों की अपार श्रद्धा हैं। गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तरह यहां कल्याणपुर में भी सोमनाथ मंदिर है। मान्यता है कि चरवाहों द्वारा की गई खोदाई में यहां पांच शिवलिंग की प्राप्ति हुई थी। चार छोटे शिवलिंग मंदिर के चार कोने पर स्थापित हैं , जबकि भगवान सोमनाथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर में नीलकंठ और अमरनाथ भगवान के दर्शन भी होते हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस मंदिर के पीछे ऐतिहासिक तालाब भी है। भगवान सोमनाथ के जलाभिषेक और अभिषेक में जो भी दूध , दही , घृत शहद आदि अर्पित किया जाता है , वह तालाब के जल में मिलता है। भक्तों में विश्वास है कि तालाब में स्नान करने से कुष्ठ समेत कई असाध्य रोग भी ठीक हो जाते थे। इस मंदिर को कुछ आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया था। एक - दो नहीं , बल्कि तीन बार यह मंदिर तोड़ा गया। मंदिर में टूटी हुई मुर्तियां आज भी इसकी गवाह हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी श्रद्धालु दर्शन - पूजन के लिए आते हैं , उनकी कामना अवश्य पूरा होती है इसीलिए यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
Read more :-
Subscribe to:
Posts (Atom)


